यह ज्योत्स्ना मिलन के जीवन और कर्म को समर्पित एक आत्मीय जगह है। उन्होंने एक कविता से साहित्य जगत में प्रवेश किया था जो उत्तरोत्तर उन्हें कथा, उपन्यास, संस्मरण, आदि अनेक विधाओं में सजग सक्रियता की ओर ले गया । इसके अलावा वे इला भट्ट द्वारा संस्थापित सेवा भारत के मुखपत्र अनसूया के साथ तीन दशक से बतौर संपादक जुड़ी रहीं। एक भाषा गुजराती होने की वजह से उन्होंने गुजराती की कई महत्वपूर्ण रचनाओं का हिंदी में अनुवाद भी किया है।

यूँ वे अपने से बड़े छोटे और समवयस्कों से साहित्यिक और असाहित्यिक अनेकानेक कारणों से जुड़ी रहीं।

यह जगह उनसे जुड़े ऐसे ही कई धागों से रेशा-रेशा मिलकर बनी है जो अपनी गति से इसमें रंग भरते रहेंगे। कुछ लोग जो अब तक कुछ लिख सके हैं, वह यहाँ संकलित है, कुछ अन्य लिखने की प्रक्रिया में हैं। और इसके अलावा उनके साहित्य कर्म पर लिखे पुराने लेखों, आलोचनाओं व समीक्षाओं को भी यहाँ इकठ्ठा करने का प्रयास है, जो धीरे धीरे इसमें जुड़ता रहेगा । यही उम्मीद की दूसरी सूरत भी है।

जो भी आत्मीय जन इस जगह से रचनात्मक रूप से जुड़ना चाहें, ज्योत्स्नाजी के बहाने लिखा कुछ यहाँ समर्पित करना चाहें, या नया कुछ लिखना चाहें, उनका स्वागत है। वे हमसे यहीं संपर्क करें।
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