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समीक्षा : बा

असो मन करे के क्याँई चली जाऊँ दूर...

ध्रुव शुक्ल

 

आज फिर बा की कहानी पढ़ रहा हूँ।इसे कभी ज्योत्सना मिलन ने रचा था । बा एक ऐसी स्त्री की कहानी है जिसका बाहर कहीं नहीं है और वह कहीं दूर बाहर जाना चाहती है।जिस घर में रहते-रहते वह पैंसठ साल की हो गयी है उसकी खिड़की पर पूनम की रात को झरते प्रकाश में सुई में धागा पिरोकर हर साल अपनी आँखों की रौशनी भर परख लेती। बा ने अपने जीवन को कैसे देखा,उसका कोई बयान इस कहानी में नहीं है।जो लोग बा के साथ रहते हैं उनका भी कोई बयान बा के बारे में नहीं। उस घर से बाहर निकलने के लिए बस एक ही दरवाजा है। बा भले ही उसके बाहर न जायें पर जब भी वे उस दरवाजे की ओर जाती दिखायी देतीं तो उनसे जरूर पूछा जाता कि कहाँ जा रही हो?

बा रोज आदिनाथ के मंदिर जाती हैं।यह मंदिर घर से इतना बाहर नहीं कि उसे दूर कहा जा सके।अगर मंदिर उनके घर में ही होता तो वे घर से इतना बाहर भी नहीं जातीं।उस घर के सब लोग जानते हैं बा को बाहर जाना नहीं आता--अगर उन्हें शहर में अकेला छोड़ दिया जाये तो वे खुद अपने घर को नहीं खोज सकतीं और वे घर में भी इतनी अकेली छूटी हुई हैं कि वहाँ भी अपने आप को नहीं खोज सकतीं।फिर भी बा का मन करता है कि क्याँई चली जाऊँ दूर...

बा का कोई मन भी है इसका प्रमाण इस कहानी में कहीं नहीं मिलता पर ज्योत्सना मिलन ने इस कहानी का जो तन रचा है उस तन पर यह भाव बार-बार झलक आता है--आज असो मन करे क्याँई चली जाऊँ दूर...कभी निर्मल वर्मा ने कथा में दुख का मन परखने की बात उठायी थी। अपनी अनेक कहानियों में वे पात्रों के दुख का मन गहराई से परखते भी रहे हैं। पर ज्योत्सना मिलन की यह कहानी पढ़ते हुए अनुभव होता है कि उन्होंने बड़ी खूबी के साथ बा के उस तन को परखने की कोशिश की है कि क्या बा का कोई मन भी है।

बा का तन सबसे दूर था--वे जबसे इस घर में आयीं,कहीं गयी ही नहीं।वे जिस घर से आयी थीं उस घर में भी लौटकर नहीं गयीं।वे अपने भाई-बन्धुओं के चेहरे भी भूल चुकी हैं।उन्हें कहीं जाने ही नहीं दिया गया।जब कभी जाने की बात आयी तो यही जवाब मिला--जाना हो तो जा,बस फिर लौटना मत।खुले आसमान के नीचे उनकी देह खुलेपन में खोना नहीं चाहती।वे एक छोटी-सी कुठरिया और छोटे-से बिस्तर पर सिमटकर ही जी सकती थीं,कहीं जा नहीं सकती थीं।अंधेरे में वे एक प्रतिमा की तरह बैठी रहतीं और जब घर के लोगों को भ्रम होता कि वे कहीं चली गयी हैं तो वे हड़बड़ाकर उन्हें दोनों हाथों से झकझोर डालते और बा--अंधेरे को ताकने की तरह ही उनको ताकतीं और गोद में रखा पंखा फिर झलने लगतीं जैसे  जी रही हों पर कहीं जा नहीं रही हों।

यह कहानी एक बड़े गहरे प्रश्न के सामने पाठक को खड़ा कर देती है--क्या कोई ऐसा तन हो सकता है जिसका कोई मन न हो और जो बिना इच्छा के किसी को भी सौंपा जा सके।जिसमें कोई बोध,शोध और अपनी हालत के प्रति क्रोध न हो।बस एक तन हो और उसका कोई मन न हो तो वह अपने से कितनी दूर और कहाँ जा सकता है।क्या ऐसे तन की कभी खुद अपना अंत करने की इच्छा भी हो सकती है।

बा का होना सहने और कहने से बहुत दूर है। वे किसी और के हाथों का विस्तार हैं।उन्होंने कभी अपने आप में कुछ होना स्वीकार ही नहीं किया। वे अपने पास कभी नहीं आ पायीं। फिर पता नहीं वे कहाँ और किससे कितनी दूर जाना चाहती हैं?अपने होने को जाने बिना कोई कहीं नहीं जाता।ज्योत्स्ना मिलन की कहानी में बा सागर किनारे की रेत पर खड़ी हैं और रेत धँसती जा रही है।

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